ढलती रही रात..

ढलती रही रात, मचलते रहे हम
आशाओं के झुरमुट में
अभिलाषाओं के कोहरे में
ढलती रही रात, बिलखते रहे हम
कभी चांद में, कभी खुद में
तो कभी इस असीम काली दीवार में
ढलती रही रात, तडपते रहे हम
इतने कडवे सन्नाटे में
अतीत से जुडते हर बोझिल क्षण में
ढलती रही रात, उलझते गए हम
जाने किस ममता को आतुर मन
तन बन बाती दुबका रहा दीपक में
ढलती रही रात, सुलगते रहे हम
विस्मृत उषा के इन्तज़ार में
संस्कृत स्वरूप की अनन्त चाह में
ढलती रही रात, पिघलते गए हम
तडपते रहे सिसकते गए
कभी नैराश्य की
तो कभी दुर्बलता की
मृदुल मदमय गोद में
सिमटे रहे, खोते गए, खोते गए
ढलती गई रात, और हम आखिरकार
प्यास अधरों से झाड के
बेचैनी को नादानी पुकार के
अपने स्वास्थ की गर्माहट में
सोते रहे, सोते रहे, सोते रहे