॥ नैराश्य ॥
बुझ चले जब दीपक सारे
तब तुम आए
नीरव था जीवन संगीत
जब तुम आए
युग बीता मृगतृष्णा से ही प्यास बुझाते
बंजर मानस अनुतर्ष मिटाने
हे मेघ बडी देर से आए ।
अभिलाषा जब है धुंधली धुंधली
आशा जब है खंडित खंडित
निर्वाण बस है
स्वप्निल स्वप्निल
अविरल तमस आसक्त हरने
हे देव बडी देर से आए ।
उच्छवासों में जीवन बीता
उर में तेरी आस लगाए
रजनी को नित अश्रु-भोग चढाए
जर्जर श्वासों का दुर्दैव
बुझाने
हे वात बडी देर से आए ।
विस्मृत मृदुल कुछ खँडहर
हैं अभी शेष
निर्वेद करुणा एक पोखर
है अभी शेष
इस खँडहर इस पोखर में कुछ अभी शेष अनुराग
फिर भी
करने प्राणों में ज्वलित चिरंतन नाद
हे उदघोष बडी देर से आए ॥