॥ निवेदन ॥
उस करुणार्द्र दृग के कोर में
सज्जित था जो नीर बसा
अतुल वेदना कर आभास उसमें -
यह सूखा दृग बोर गया
पल्लवित कर उर में अभिलाषा
इन होंठो से मिटा विषाद
खिले कुमुद प्रत्यूष जब -
उन होंठो से तितीर्षा बहा
शोभित कर दो इस तम-पंक को
कंपित कर दो मुझमें सुधा राग
शीतल कर दो मेरा जीवन अभिशाप
आ जाओ ! बस एक बार बस एक बार ।
स्वीकारो स्वर्ण निवेदन यह लाचार ॥