तुम आ जाओ वीणा लेकर
मैं दीप जलाकर रखूंगा
तेरे नूपुर की आहट में
उर का स्पंदन सुलाकर रखूंगा
तेरी सांसों का परिमल कब आ जाए
अलसाई वात को जगाकर रखूंगा
तुम आकर शायद दो पल तो स्नेह बिखराओगी
बस उन दो क्षण में अपने सारे जीवन का
ताप मिटाकर रखूंगा
तुम आ जाओ वीणा लेकर
मैं दीप जलाकर रखूंगा
उन तारों की झनकारों में
मैं घुलमिल कर सो जाऊंगा
तेरे होठों से बहते गीतों में
मैं लेकर नौका गुम हो जाऊंगा
तेरी करुणा ठहरी पारावार
मेरी विकृत जीवन-दृष्टि को
पल भर में धो डालेगी
सुरों में तेरे एक सुर बन जाऊंगा
तुम आ जाओ वीणा लेकर
मैं दीप जलाकर रखूंगा
(महादेवी को समर्पित)